आँखें कितना रोती हैं जब
उंगली अपनी जलती है
सोचो उस तड़पन की हद
जब जिस्म पे आरी चलती है॥
बेबसता तुम पशु की देखो
बचने के आसार नहीं
जीते जी तन काटा जाए
उस पीडा का पार नहीं
खाने से पहले बिरयानी
चीख जीव की सुन लेते।।
करुणा के वश होकर तुम भी
गिरी गिरनार को चुन लेते॥🙏
उंगली अपनी जलती है
सोचो उस तड़पन की हद
जब जिस्म पे आरी चलती है॥
बेबसता तुम पशु की देखो
बचने के आसार नहीं
जीते जी तन काटा जाए
उस पीडा का पार नहीं
खाने से पहले बिरयानी
चीख जीव की सुन लेते।।
करुणा के वश होकर तुम भी
गिरी गिरनार को चुन लेते॥🙏
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